Nauhas for Muharram and all Wafaats
Maatams for Muharram and all Wafaats
Nauhas
   
  दो महोर्रम
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दूसरी माहे मर्होरम की है रोएँ मोमिनीयं
कर्बला में आ चुके हैं मालिके ख़ुल्दे बरीन

बिस्तो हशतुम को रजब की जब चले सुल्ताने दीन
और आबादा हुयी चलने या बीमारो हज़ी

शह ने फरमाया के बीमारी में क्योंकर साथ लूँ
फात्मा सुग़रा अभी कुछ रोज़ तुम ठहरो यहीं

जब किसी जा पर हमारा होगा ऐ बेटी क़याम
भेजकर अकबर को बुलवा लेंगे हम तुमको वहीं

शह से सुग़रा ने कहा अच्छा अगर जाते हैं आप
रहने दीजिए मेरे छोटे भाई को बाबा यहीं

जान से अपनी ज़्यादा है मुझे असग़र अज़ीज़
इसकी फुरक़त में मैं मर जाऊँगी बीमारे हज़ीन

बाद इसके गोद में सुग़रा ने असग़र को लिया
और कहा रोकर सिधारें अब शहे दुनिया ओ दीन

जब बहुत इसरार असग़र के लिये शह ने किया
तब यह बाते यासो हसरत से भरी सुग़रा ने कीं

खुद से गर असग़र चला जाए किसी की गोद में
तो खुशी से साथ ले जाएँ इमामल मुत्तक़ीं

सुन के यह फैलाए सबने हाथ असग़र की तरफ़
पर न उतरा गोदसे वह कौकबे - चरख़े बरीं

निज़दे असग़र उसके बाद आए हुसैन इब्ने अली
और कहा यह कान में असग़र के क्यों एै महजबीन

बख़्शीशे उम्मत का क्या तुमको नहीं मुतलक़ ख़्याल
अब चलो कब्रों बला एै नजमे खत्मुल मुरसलीन

सुनके यह आवाज शह की गोद में आया वह तिफ़्ल
अल गरज़ राही हुए वाँ से सिपेहसालारे दीन

वह सफ़र एहले हरम का और वह बच्चों का साथ
धूप की हिद्दत हवाएँ गरम और तपती जमीं

रास्ते की सख्तियाँ सहते हुए वारिद हुए
दूसरी माहे अज़ा को कर्बला में शाहे दी

'फिक्र' को अब हिन्द में रहना बहुत दुशवार है
अपने रौज़े पर बुला लो या इमामल मुत्तकीं

 

Please Recite Fateha for Marhoom - Syed Wirasat Ali Rizvi ibne Syed Mustafa Hussain Rizvi.
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